मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लोगों को जागरूक करेंगे शिक्षक

 *मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लोगों को जागरूक करेंगे शिक्षक*


*वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने हेतु जिला स्तरीय कार्यशाला का उद्घाटन डायट बहराइच में*

रिपोर्ट/- सुरेश कुमार 

*रामगांव/पयागपुर:-बहराइच*    “सामुदायिक सहभागिता और लोक मीडिया के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जनजागरूकता फैलाने हेतु जिला स्तरीय कार्यशाला” का शुभारंभ 4 अगस्त 2025 को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में हुआ। यहां से प्रशिक्षित शिक्षक ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करेंगे। यह कार्यक्रम  भारत सरकार की संस्था राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (NCSTC) तथा  इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड एडवांस्ड स्टडीज के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है।



मुख्य अतिथि वर्ल्ड वाइल्ड फंड के सीनियर प्रोजेक्ट ऑफिसर दबीर हसन ने कहा कि वर्तमान समय में मानव अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए वन्यजीव क्षेत्रों में प्रवेश करता जा रहा है। अब समय आ गया है कि लोगो को इसके प्रति जागरूक कीकिया जाए,  अन्यथा वन्य जीव और मानव संघर्ष बढ़ता जाएगा जिसके परिणाम घातक होंगे। 


अध्यक्षीय  संबोधन में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्व विद्यालय लखनऊ के प्रोफेसर अरविंद कुमार सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षणथियों का मार्गदर्शन किया और कार्यशाला में विकसित हुयी विज्ञान आधारित पटकथा के आधार पर अपने -अपने विद्यालय और गाँव में विज्ञान पुतुल नाटक आयोजित करने को प्रोत्साहित किया। 


नोडल अधिकारी रमेश सर ने कहा कि समाज में ऐसा कुछ नहीं जो विज्ञान से जुड़ा न हो।  इसलिए विज्ञान संचार अति आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्र जहाँ आज भी आधुनिक संचार माध्यम नहीं पहुँच रहें है।  वहाँ विज्ञान जैसे विषय को परम्परागत माध्यमों से प्रभावशाली तरीके से प्रसारित किया जा सकता है।  इसके लिए कठपुतली (पुतुल) मध्यम अहम भूमिका निभा सकता है। 


लोक मीडिया विशेषज्ञ श्रीनारायण श्रीवास्तव ने कठपुतली कला के माध्यम से वैज्ञानिक जागरूकता के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण तथा मानव-जानवर टकराव की रोकथाम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आकर्षक प्रस्तुति दी ।

मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. तारिक बदर, पूर्व नियंत्रक, सीएसआईआर-एचआरडीसी, नई दिल्ली ने वैज्ञानिक सोच के प्रचार-प्रसार में पारंपरिक मीडिया की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव को समझने और उसका समाधान खोजने के लिए भी वैज्ञानिक सोच और सामुदायिक सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. रंजीत कुमार ने बताया कि यह कार्यशाला पाँच दिन चलेगी, जिसमे प्राथमिक विद्यालयों के 30 शिक्षक प्रतिभाग कर रहे है। ये सभी शिक्षक ग्रामीण क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए पुतुल निर्माण, पटकथा लेखन एवं नाट्य मंचन सीख रहें हैं। इसके उपरांत अपने क्षेत्रों में मानव वन्य जीव संघर्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पर्यवरण और स्वच्छता के बारे इन्ही माध्यमों से प्रस्तुति देंगे।

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