बहराइच गौशाला में भूंख और प्यास से तड़फ तड़फ कर दम तोड़ रहे हैं बेजुबान जानवर सूखा सडा भूसा खाने पर हैं मजबूर

 बहराइच गौशाला में भूंख और प्यास से तड़फ तड़फ कर दम तोड़ रहे हैं बेजुबान जानवर सूखा सडा भूसा खाने पर हैं मजबूर  



बहराइच से संवाददाता अहमद हुसैन की रिपोर्ट 





जिला बहराइच विकासखंड चित्तौरा ग्राम पंचायत आलिया बुलबुल का है जहां पर गौशाला का बदतर हाल भूख प्यास से तड़फ रहे हैं बेजुबान जानवर 



 गौशालाओं को बेहतर बनाने के लिए हर ग्राम पंचायत में लाखों की धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है। सरकार का साफ कहना है कि कोई भी बेसहारा जानवर भूख, प्यास या इलाज के अभाव में अपनी जान न गँवाए।



लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग और चौंकाने वाली है।

जनपद बहराइच के विकासखंड चित्तौरा के ग्राम पंचायत आलिया बुलबुल की गौशाला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


जब हमारी टीम मौके पर पहुँची तो देखा कि इतने बड़े गौशाला में कई दर्जनों पशुओं की देखभाल के लिए सिर्फ एक ही केयर टेकर मौजूद था। न तो वहाँ पर्याप्त स्टाफ था, न ही पशुओं के लिए सही इलाज का इंतज़ाम।

जानवरों को खिलाने के लिए जो चारा उपलब्ध कराया गया, वह भी सूखा और सड़ा हुआ भूसा था—जो न केवल अपच और बीमारी को न्योता देता है, बल्कि यह इन मासूम बेजुबान जानवरों की जिंदगी से सीधा खिलवाड़ है।


जानकारी के मुताबिक, कल यानी 15 अगस्त 2025 को, भूख-प्यास और इलाज के अभाव में एक बेसहारा जानवर ने दम तोड़ दिया। वहीं, गौशाला में एक और गाय गंभीर रूप से बीमार है और मौत से जूझ रही है।


अब सवाल यह है कि जब सरकार की तरफ़ से करोड़ों रुपये का फंड गौशालाओं के लिए दिया जाता है, तो वह पैसा आखिर जा कहाँ रहा है?

क्या यह फंड वास्तव में गौशालाओं तक पहुँचता है, या फिर कागज़ों पर खर्च दिखाकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया जाता है?


ग्राम पंचायत प्रधान, जिनकी जिम्मेदारी है कि गौशाला का संचालन और मॉनिटरिंग सही ढंग से हो—उनकी कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अगर प्रधान और जिम्मेदार लोग समय-समय पर निरीक्षण करते, तो हालात इतने बदतर न होते।


स्थानीय ग्रामीणों और समाजसेवियों का आरोप है कि गौशाला के नाम पर पैसा तो आता है, लेकिन उस पैसे का ज़्यादातर हिस्सा ज़मीनी हकीकत तक पहुँचता ही नहीं।

ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारियों को शिकायतें दी गईं, लेकिन हर बार सिर्फ़ आश्वासन मिलता है—

लेकिन आज तक न तो हालात बदले, न ही कोई ठोस कदम उठाया गया।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार योजनाएँ बनाती है, बजट जारी करती है और पंचायतों को पैसा देती है—तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा कि इन योजनाओं का लाभ वास्तव में बेजुबान जानवरों तक पहुँचे?


यह सिर्फ़ एक गौशाला की तस्वीर नहीं है, बल्कि प्रदेश भर की उन तमाम गौशालाओं का आईना है जहाँ योजनाएँ कागज़ों पर चमकती हैं, लेकिन ज़मीन पर बेजुबान जानवर भूख प्यास और बीमारी से तड़प-तड़पकर मर जाते हैं।


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