शिक्षक दिवस पर विशेष लेख
रिपोर्ट - विनोद श्रीवास्तव
स्टेट हेड टीवी इंडियन न्यूज बहराइच
सूचना बुद्धि को भर सकती है परंतु विवेक नहीं जगा सकती ।
पुस्तकें रास्ते दिखा सकती है परंतु सही राँह चुनने की दृष्टि गुरु देता है। गुरु वह नहीं जो अक्षरों का ज्ञान कराये, गुरु वह है जो प्रश्नों से भरे मन को विवेक की दिशा दे, असंतोष से भरे मन को सृजन का मार्ग दिखाये और युवा ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण की शक्ति बना दे। यह पुण्यभूमि भारत गुरु शिष्य परम्परा की तपस्थली रही है। यहाँ शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, समाज का पथप्रदर्शक ,चरित्र का निर्माता और राष्ट्र के भविष्य का शिल्पकार माना गया है। आज वर्तमान परिस्थति में प्रश्न है- तेजी से बदलते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश में युवाओं के भीतर बढ़ रही असहजता, असंतोष और भविष्य की चिंता को सही दिशा कौन देगा। इसका उत्तर कहीं न कहीं शिक्षक की भूमिका में दिया है।
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आज की युवा पीढी केवल सुनने वाली नहीं बल्कि समझने वाली और अपनी बात कहने वाली पीढी है। उसके हाथ में आधुनिक तकनीकी है और उसके मन में असीम सम्भावनाएं हैं किंतु मन के भीतर बेचैनी भी है, भविष्य की चिंता, प्रतिस्पर्धा का दबाव, रोजगार की चुनौती और परीक्षा एवं अवसरों की अनिश्चितता सामाजिक अपेक्षाओं का बोझ है। ऐसे समय में युवाओं के मध्य उपजा असंतोष केवल नकारात्मकता का संकेत नहीं है बल्कि यह असंतोष उस चेतना का प्रमाण है जो बेहतर भविष्य की आकांक्षा रखती है। प्रश्न यह नहीं है कि युवा असंतुष्ट क्यों है बल्कि यह है कि उसके असंतोष को सुना कौन रहा है दिशा कौन दे रहा है। देश की राजधानी दिल्ली का जंतर मंतर समय-समय पर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का साक्षी रहा है यहाँ उठने वाली आवाजें केवल नारों की आवाजे नहीं है बल्कि उनके पीछे संघर्षों की कहानी होती है, कभी उम्मीद की प्रतीक्षा ,
कभी व्यवस्था से प्रश्न तो कभी भविष्य की चिंता भी होती है। वर्तमान समय में युवाओं द्वारा 'विभिन्न मुद्दों पर अपनी आवाज उठाना इस बात का संकेत है कि नई पीढी भविष्य को लेकर सजग है। अवसर पारदर्शिता और मेहनत का न्यायपूर्ण परिणाम चाहती है। यह युवा असंतोष महत्वपूर्ण संदेश देता है कि युवा केवल भविष्य ही नहीं वर्तमान की सक्रिय चेतना भी है। परंतु असंतोष को दिशा, प्रश्न को उत्तर और आंदोलन. को विवेक चाहिए । असहमति और अधिकार एक नहीं है। आंदोलन न्याय की मांग करता है लेकिन संस्कारों को त्यागकर किया गया आन्दोलन अपनी नैतिक शक्ति स्वयं कमजोर कर देता है। युवाओं को यह समझना होगा क्रांति और उच्छृंखता में अंतर है। संघर्ष और आराजकता एक नहीं है। अपनी बाते को दृढता से कहना आवश्यक है परंतु भाषा और व्यवहार की मर्यादा बनाये रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। अधिकारों की आवाज जितनी ऊंची हो आचरण की मर्यादा उतनी ही ऊँची होनी चाहिए। यदि कोई युवा व्यवस्था से प्रश्न करता है तो शिक्षक का दायित्व है कि वह उसे सिखाये अपनी बात कहो परंतु मर्यादा के साथ, प्रश्न करो लेकिन तथ्य के आधार पर, असहमति व्यक्त करें लेकिन संवाद के माध्यम से और परिवर्तन चाहें लेकिन समाज को तोडकर नहीं बल्कि जोड़कर । यही लोकतान्त्रिक संस्कार है. सच्ची चेतना है और राष्ट्रीय एकता का परिपक्व स्वरूप है। आज का युवा अधिकारों के प्रति जागरुक है यह सकारात्मक संदेश है लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य की चेतना भी आवश्यक है। जिस दिन युवा यह समझ जायेगा कि मैं केवल अपने ही लिए नहीं समाज के लिए भी जिम्मेदार हूँ उस दिन राष्ट्रनिर्माण की गति और भी तेज हो जायेगी।
आज सूचना के स्त्रोत असंख्य है मोबाईल इंटरनेट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि द्वारा, कुछ ही क्षण में दुनिया भर की जानकारी प्राप्त हो जाती है किंतु प्रश्न यह है कि हर जानकारी ज्ञान नहीं होती है। जानकारी और ज्ञान में अंतर है। ज्ञान और विवेक में अंतर है। आज का शिक्षक सूचना के युग में विवेक, का प्रहरी है। युवा मन में ऊर्जा होती है, कभी यही ऊर्जा प्रश्न करती है. कभी असंतोष बनती है. कभी संघर्ष बनती है शिक्षक का कार्य उस ऊर्जा को दबाना नहीं बल्कि उसे दिशा देना है। एक शिक्षक द्वारा कही गयी बात विद्यार्थी को ज्ञान दे सकती है लेकिन शिक्षक द्वारा सुना गया विद्यार्थी उसे विश्वास देता है जब विद्यार्थी को विश्वास मिलता है तो सकारात्मकता विकसित होती है। आज युवाओं को समस्या बताने वाला नहीं, समाधान खोजने वाला बनाया जाए। आज युवाओं में ऊर्जा की कमी नहीं है उन्हें आवश्यकता है सही मंच और सही दिशा की। राष्ट्र निर्माण केवल संसद द्वारा नहीं होता बालक विद्यालयों, प्रयोगशालाओं, ईमानदार कार्यालयों में भी होता है और राष्ट्र निर्माण शिक्षक की उस कक्षा में भी होता है जहाँ पर विद्यार्थी को पहली बार यह विश्वास होता है कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ। शिक्षक केवल विद्यार्थी नहीं पढ़ाता है समाज की मानसिकता तैयार करता है यदि शिक्षक ईमानदारी सिखाता है तो समाज में ईमानदारी बढ़ती है यदि शिक्षक संवेदनशीलता सिखाता है तो समाज में मानवता बढ़ती है और यदि शिक्षक प्रश्न करना, सोचने और समाधान खोजने की क्षमता देता है तो लोकतंत्र
मजबूत होता है। आज शिक्षक दिवस केवल सम्मान का अवसर नहीं आत्ममंथन का अवसर भी है। युवा ऊर्जा यदि असंतोष में भटकेगी तो समाज चिंतित होगा लेकिन जब यही ऊर्जा शिक्षक के मार्गदर्शन से विवेक, कर्तव्यबोध और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ेगी तब इतिहास रचेगी। शिक्षक केवल भविष्य का निर्माण ही नहीं करता है बल्कि वह भविष्य को सही दिशा देता है। जिस राष्ट्र के शिक्षक जागरूक होंगे युवा पीढी कभी दिशाहीन नहीं होगी। यही शिक्षक की शक्ति है, दायित्व है और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त आधार है। अन्तत : शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर सभी को बहुत-बहुत शुभकामनायें । ध्यान रहे
*Rights give us freedom , but duties gives us Responsibility.*
अखिलेश कुमार बाजपेयी
शिवपुर बहराइच

